उच्च पावर स्विचिंग युक्तियाँ ( High Power Switching Devices )

। पावर अर्द्धचालक युक्तियाँ Power Semiconductor Devices ) पावर अर्द्धचालक युक्तियाँ निम्न वर्गों में विभाजित की जा सकती हैं ( i ) पावर डायोड ( ii ) पावर बाइपोलर जन्कशन ट्रांजिस्टर ( BJTs ) ( iii ) पावर मोसफैट ( MOSFET ) iv ) इन्सुलेटिड गेट बाइपोलर जन्कशन ट्रांजिस्टर ( IGBJTs ) ( v ) थायरिस्टर इन युक्तियों को स्विचिंग मोड में प्रचालित किया जाता है जिससे हानियां ( losses ) कम हो जाती हैं तथा रूपान्तरण दक्षता में वृद्धि हो जाती है । किन्तु स्विचिंग मोड के प्रचालन में हारमोनिक्स तथा रेडियो आवृत्ति व्यतिकरण ( RFI ) उत्पन्न हो जाता है $ 2.2 अर्द्धचालक ( Semi conductor ) ) प्रस्तुत विवेचन में हम अर्द्धचालकों के सामान्य अध्ययन का समावेश करेंगे ।

अर्द्धचालक वह ठोस पदार्थ होता है जिसकी वैद्युत चालकता चालकों से कम परन्तु वैद्युत अवरोधियों से अधिक होती है । जो दो सामान्य अर्द्धचालक प्रयुक्त किये जाते हैं वे जरमेनियम व सिलीकॉन होते हैं । आजकल इलेक्ट्रॉनिकी में अर्द्धचालक युक्तियों ( डायोडों व ट्रॉजिस्टरों ) का ही उपयोग किया जाता है । वाल्व युक्तियों के स्थान पर अर्द्धचालक युक्तियों का उपयोग करने के निम्न लाभ होते हैं । एक अर्द्धचालक डायोड के अभिलक्षण उच्च निर्वात् डायोड के ही समान होते हैं । अतः निर्वात् डायोड के स्थान पर अर्द्धचालक डायोड का उपयोग किया जा सकता है । इसी प्रकार ट्रॉजिस्टर वह अर्धचालक युक्ति होती है जोकि एक निर्वात् ग्रिड नियंत्रित वाल्व की तरह होता है ।

अत : इसका उपयोग प्रवर्धक के रूप में किया जा सकता है । अर्द्धचालक भौतिकी में विकास के कारण आजकल इन्टीग्रेटिड सर्किट प्रयुक्त किये जाते हैं जिन पर इन अर्द्धचालक युक्तियों को फेब्रीकेट किया जाता है । अर्द्धचालक युक्तियों में निर्वात् या गैस भरे वाल्वों की तुलना में निम्न गुण होते हैं । 1. इनमें किसी कैथोड तापन की आवश्यकता नहीं होती है । अत : तापन के लिये पावर की आवश्यकता नहीं होती है साथ ही तापन कैथोड के जल जाने या नष्ट होने का भी डर नहीं होता है । 2. इन युक्तियों का आकार अपेक्षाकृत बहुत ही सूक्ष्म होता है । साथ ही इन्टीग्रेटिड सर्किटों के उपयोग से तो आकार और भी कम हो जाता है । 3. इन युक्तियों का जीवन काल बहुत ही अधिक होता है । 4. इन युक्तियों के प्रचालन में बहुत ही कम पावर की आवश्यकता होती है । 5. इनमें कोई भी माइक्रो फोनिक कठिनाई नहीं होती है ।

$ 2.3 पी ० एन ० सन्धि ( P. N. Junction ) जब एक जरमेनियम या सिलीकॉन क्रिस्टल के एक ओर दाता अशुद्धि तथा दूसरी ओर स्वीकारक अशुद्धि दी जाती है , तो इस युक्ति को पी ० एन ० सन्धि ‘ कहते हैं । इसी प्रकार की संधि को बनाने के लिये जरमेनियम में पहले एक प्रकार की अशुद्धि मिलायी जाती है तथा एक प्रकार की अशुद्धि को मिलाने की क्रिया के बीच में ही उसमें दूसरी प्रकार की अशुद्धि मिलायी जाती हैं , जिससे क्रिस्टल का एक भाग इस प्रकार की अशुद्धि से तथा शेष भाग दूसरी प्रकार की अशुद्धि से युक्त हो जाता है । चित्र 2.1 पी ० एन ० सन्धि दिखाई गई है । इस चित्र से स्पष्ट है कि क्रिस्टल का एक भाग P टाइप तथा दूसरा भाग N- टाइप अर्द्धचालक बन जाता है । चित्र में P- भाग में छोटे खाली गोले विवा को तथा ऋण चिन्ह से बड़े गोले ( – ) माही अशुद्धि के परमाणु के ऋण आयन को प्रदर्शित करते हैं ।

N- भाग में छोटे काले गोले इलेक्ट्रॉन को तथा धन चिन्ह के बड़े गोले ( + ) दाता अशुद्धि के परमाणु के धन आयन को प्रदर्शित करते हैं । सरलता कारण अल्पसंख्यक ( Minority ) आवेश नहीं दिखाये गये हैं । इस प्रकार संधि के P भाग में विवरों के कारण तथा N भाग में इलेक्ट्रॉनों के कारण धारा प्रवाह होता N टाइप भाग बाहा विभव के बिना पी ० एन ० सन्धि ( P. N. Junction with no External Voltage ) संधि बनने पर सन्धि के एक ओर N टाइप भाग में मुक्त इलेक्ट्रॉन तथा दूसरी ओर P भाग में विवर होते हैं । N टाइप के भाग में बहुत अधिक संख्या में अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा के मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं जो ‘ मैजोरिटी कैरियर ‘ कहलाते हैं । साथ ही इस में कुछ विवर भी होते हैं जो ‘ अल्पसंख्यक वाहक ‘ ( minority carrier ) कहलाते हैं । इसी प्रकार संधि के P भाग में विवर मैजोरिटी कैरियर तथा इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक के रूप में होते हैं ।

अल्पसंख्यक वाहक इन्ट्रेन्जिक धातु के ऊष्मीय कम्पन से उत्पन्न होते हैं । N भाग के उच्च ऊर्जा के कुछ इलेक्ट्रॉन सन्धि को पार करके भाग में पहुंचकर विवरों से संयोग करके समाप्त हो जाते हैं । इसी प्रकार P भाग के कुछ विवर संन्धि को पार करके N भाग के इलेक्ट्रॉनों से संयोग करके समाप्त हो जाते 4 हैं । इस प्रकार संन्धि के दोनों ओर एक बहुत पतली पर्त ( लगभग 10 सेमी ) ऐसी पैदा हो जाती है जिसमें न तो इलेक्ट्रॉन ही होते हैं और न विवर ही अर्थात् उस पर्त में इलेक्ट्रान तथा विवर का अवक्षय ( depletion ) हो जाता है ।

इसीलिये इस पर्त को अवश्य परत ( depletion layer ) कहते है जिसे चित्र 2.2 में दिखाया गया है । चित्र में ऋण गोले अशुद्धि के ‘ ग्राही आयन ‘ को तथा धन गोले अशुद्धि के ‘ दाता आयन ‘ को प्रदर्शित करते हैं । इससे स्पष्ट है कि अवक्षय परत के P साइड में इलेक्ट्रान विवर के संयोग होने के कारण धनात्मक आवेश की कमी हो जाती है । अतः अवक्षय परत P साइड में ऋणात्मक हो जाती है । इसी प्रकार अवक्षय परत के N साइड में विवर का इलेक्ट्रान से संयोग होने के कारण ऋणात्मक आवेश की कमी हो जाती है ।

अत : अवक्षय परत N साइड में धनात्मक हो जाती है । अतः अवक्षय परत के दोनों सिरों पर एक वि ० वा . बल कार्य करने लगता है जिसका उच्च विभव ( धनात्मक ) सिरा N टाइप तथा ऋणात्मक सिरा P टाइप जरमेनियम पर जुड़ा माना जाता है । यह वि ० वा . बल इलेक्ट्रॉन या विवर को सन्धि पार करने से रोकता है , क्योंकि N साइड की धनात्मक ध्रुवता विवर को प्रतिकर्षित करती है । इस प्रकार से इलेक्ट्रान तथा विवर का सन्धि पार करना रुक जाता है और फिर अवक्षय परत की मोटाई नहीं बढ़ सकती ।

इस प्रकार एक बार जितनी मोटाई की अवक्षय परत बन जाती है वह उतनी ही मोटी रहती है , बढ़ती नहीं है । इसके अतिरिक्त P तथा N भाग में उपस्थित अल्पसंख्या वाले ( P में इलेक्ट्रॉन तथा N में विवर ) कण भी उच्च ऊर्जा के कारण ही सन्धि पार कर सकते हैं और अवक्षय परत के सिरों पर उत्पन्न वि ० वा ० बल को कम करते हैं । किसी P. N. सन्धि के दोनों ओर बनी अवक्षय परत के सिरों पर उत्पन्न हुआ विद्युत वाहक बल , ‘ सम्पर्क विभव ‘ ( Contact Potential ) या ‘ रोधिका विभव ‘ ( Barrier Potential ) कहलाता है ।

जरमेनियम को PN . सन्धि के लिये रोधिका विभव 0-2 से 0-3 वोल्ट तथा सिलीकॉन को PN . सन्धि के लिए वह 0-7 वोल्ट के क्रम का होता है । $ 2.5 पी ० एन ० सन्धि : अग्र बायस में ( P. N. Junction with Forward Bias ) PN . सन्धि के दोनों सिरों पर एक बाहरी बैटरी इस प्रकार जोड़ दी जाती है , कि बैटरी का धनात्मक सिरा P के तथा ऋणात्मक सिरा N से सम्बन्धित हो जाता है जैसा कि चित्र 2.3 में दिखाया गया है । चित्र में स्पष्ट है कि बाहरी विद्युत वाहक बल रोधिका विश्व के विपरीत होता है ।

अतः बाहरी बैटरी ( वि . वि . बल ) रोधिका विभव के विरुद्ध कार्य करेगी जिसके परिणास्वरूप PN . सन्धि का रोधिका विभव घट कर इतना कमजोर हो जाता है कि अब वह N भाग से इलेक्ट्रॉनों तथा P भाग में विवरों को सन्धि पार करके इधर – उधर जाने से नहीं रोक सकता । अतः PN . सन्धि के साथ एक बाहरी बैटरी जोड़ने पर N भाग से इलेक्ट्रॉनों तथा P भाग से विवरों को सन्धि पार करके इधर – उधर जाने से नहीं रोक सकता । अत : P. N. सन्धि के साथ एक बाहरी बैटरी जोड़ने पर N भाग से इलेक्ट्रॉन सन्धि को पार करके P भाग ( धनात्मक धूव की ओर ) में तथा P भाग से विवर N भाग ( ऋणात्मक ध्रुव की ओर ) में आने जाने लगते हैं । अतः PN . सन्धि के दोनों सिरों पर एक बाहरी बैटरी का धन सिरा P पर तथा ऋण सिरा N भाग से जोड़ने पर सन्धि के बहुसंख्यक आवेश वाहक majority charge carriers ) सन्धि को पार करने लगते हैं तथा सन्धि विद्युत का चालन करने लगती है । स्पष्ट है कि P भाग में विवरों की गति के कारण तथा N भाग में इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण ही धारा का चालन होता है ।

” किसी PN सन्धि के दोनों सिरों पर बाहरी बैटरी को इस प्रकार जोड़ने की क्रिया को , जिसमें बाहरी वि ० वा ० बल आन्तरिक रोधिका विभव के विरुद्ध कार्य करके उसे कम या समाप्त कर देता है तथा सन्धि चालन अवस्था में आ जाती है , ‘ अग्र बायस ‘ Forward Bias ) कहते हैं । ” 52.6 . पी ० एन ० सन्धि उत्क्रम बायस में ( P. N. Junction with Reverse Bias ) यदि बाहरी बैटरी के धन ध्रुव को सन्धि के N भाग से तथा ऋण ध्रुव को P भाग में जोड़ दे ( चित्र 2.4 ) तो बाहरी वि . वा . बल भी आन्तरिक विभव की ही दिशा कार्य करने लगता है , जिससे आन्तरिक विभव रोधिका ( potential barrier ) और भी शक्तिशाली हो जाता है ।

अत : N भाग के इलेक्ट्रॉन सन्धि को लांघकर P भाग में , तथा P भाग के विवर सन्धि को लांघकर N भाग में नहीं जा सकते जिससे सन्धि में धारा प्रवाह नहीं हो पाता अर्थात् सन्धि ‘ अचालन अवस्था ‘ ( Non conducting state ) में आ जाती है । ” किसी PN सन्धि के दोनों सिरों पर बाहरी को इस प्रकार जोड़ने की क्रिया को जिसमें बाहरी वि ० वा ० बल आन्तरिक रोधिका विभव की दिशा में होने के कारण उसे बढ़ा देता है , और सन्धि अचालन अवस्था में आ जाती है , उत्क्रम बायस reversed Bias ) कहते हैं । स्पष्ट है कि रोधिका विभव के बढ़ जाने के कारण बहुसंख्यक ( Majority ) आवेश वाहकों के लिये सन्धि को पार करना अधिक कठिन हो जाता है ।

किन्तु रोधिका विभव अल्प वाहकों ( Minority carriers ) को सन्धि पार करने में सहायक होता है । अर्द्धचालक के ताप के कारण जैसे जैसे अल्प वाहक उत्पन्न होते हैं , वे रोधिका विभव के कारण सन्धि को पार करते हैं । यदि अर्द्धचालक का ताप नियत है तो अल्प वाहकों का उत्पन्न होना भी नियत रहता है अत उनके प्रवाह के कारण धारा भी नियत रहती है चाहे बाह्य बैटरी का विभव कम हो या अधिक , इस कारण से इस धारा को उत्क्रम संतृप्त धारा ( reverse saturation current ) कहते हैं ।

यह धारा बहुत कम होती है क्योंकि अल्प वाहकों की संख्या भी बहुत कम होती है । ” यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि उत्क्रम बायस में PN सन्धि का मध्य का अवक्षय क्षेत्र ( depletion region ) उच्च प्रतिरोधकता का तथा बाहरी P तथा N भाग कम प्रतिरोधकता के होते हैं । इस प्रकार P तथा N भाग संधारित्र ( condenser ) की प्लेटों की तरह तथा मध्य का क्षेत्र परावैद्युत ( dielectric ) की तरह कार्य करते हैं । अतः उक्रम अभिनति में PN सन्धि की एक प्रभावी धारिता ( capacitance ) होती है जिसे अवक्षय धारिता ( depeletion or transition capacitance ) कहते हैं ।

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